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सवा सेर गेहूँ - मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Sawa Ser Gehun - A Story by Munshi Premchand ||

 


https://youtu.be/3fr-QY-OxOk?si=RNXheSLfOdXR7_O1

आज सुनिए मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी सवा शेर गेहूं किसी गांव में शंकर नाम का एक कुर्मी किसान रहता था। सीधा साधा गरीब आदमी था अपने काम से काम ना किसी के लेने में, ना किसी के देने में छक्का पजा ना जानता था छल प्रपंच की, उसे छूट भी ना लगी थी ठगे जाने की चिंता ना थी ठग विद्या ना जानता था भोजन मिला, खा लिया ना मिला चबे ने पर काट दी।जबैना भी ना मिला तो पानी पी लिया और राम का नाम लेकर सो रहा किन्तु जब कोई अतिथि द्वार पर आ जाता था तो उसे इस नृत्य मार्ग का त्याग करना पड़ता था। विशेषकर जब साधु महात्मा पदार्पण करते थे तो उसे अनिवार्य सांसारिकता की शरण लेनी पड़ती थी। खुद भूखा सो सकता था, पर साधु को कैसे भूखा सुलाता?


भगवान के भक्त जो ठहरे 1 दिन संध्या समय एक महात्मा ने आकर उसके द्वार पर डेरा जमाया।तेजस्वी मूर्ति थी पीतांबर गले में जटा, सिर पर पीतल का कमंडल हाथ में खड़ा हुआ, पैर में ऐनक आँखों पर सम्पूर्ण वेश उन महात्माओं का था जो रईसों के प्रसादो में तपस्या, हवा, गाड़ियों पर देवस्थानों की परिक्रमा और योगसिद्धि प्राप्त करने के लिए रुचिकर भोजन करते हैं। घर में जौ का आटा था। वह उन्हें कैसे खिलाता?


प्राचीन काल में जौ का चाहे जो कुछ महत्त्व रहा हो।पर वर्तमान युग में जौ का भोजन सिद्ध पुरुषों के लिए दुष्पाच्य होता है। बड़ी चिंता हुई महात्मा जी को क्या खिलाऊं?


आखिर निश्चय किया कि कहीं से गेहूं का आटा उधार लाऊं पर गांव भर में गेहूं का आटा न मिला। गांव में सब मनुष्य ही मनुष्य थे, देवता एक भी न था, देवताओं का खाद्य पदार्थ कैसे मिलता?


सौभाग्य से गांव के विप्र महाराज के यहाँ से थोड़ा सा मिल गए।उनसे सवा शेर गेहूं उधार लिया और श्री से कहा की पीस दे, महात्मा ने भोजन किया, लम्बी तान कर सोये, प्रातः काला आशीर्वाद देकर अपनी राह ले विप्र महाराज साल में दो बार खलिहानी लिया करते थे। शंकर ने दिल में कहा सवा शेर गेहूं, इन्हें क्या लौट आऊं पंसेरी बदले को ज्यादा खलिहानी दे दूंगा ये भी समझ जाएंगे, मैं भी समझ जाऊंगा।चैत में जब विप्रजी पहुंचे तो उन्हें डेढ़ पंसेरी के लगभग गेहू दे दिया और अपने को उरण समझ कर उसकी कोई चर्चा ना की विप्रजी ने फिर कभी ना मांगा सरल शंकर को क्या मालूम था की ये सवा शेर गेहूं चुकाने के लिए मुझे दूसरा जन्म लेना पड़ेगा। 7 साल गुजर गए विप्रजी विप्रसि महाजन हुए शंकर किसान से मजबूर हो गया।उसका छोटा भाई मंगल उससे अलग हो गया था। एक साथ रह कर दोनों किसान थे, अलग हो कर मजबूर हो गए थे। शंकर ने चाहा की द्वेष की आग भड़कने ना पाए। किन्तु परिस्थिति ने उसे विवश कर दिया। जीस दिन अलग अलग चूल्हे जले, वह फूट फूट कर रोया आज से भाई भाई शत्रु हो जाएंगे, एक रोएगा दूसरा हसेगा एक के घर मातम होगा तो दूसरे के घर गुलगुले पकेंगे प्रेम का बंधन, खून का बंधनदूध का बंधन आज टूटा जाता है। उसने भगीरथ परिश्रम से फूल मर्यादा का वृक्ष लगाया था, उसे अपने रक्त से सींचा था, उसको जड़ से उखड़ता देख कर उसके हृदय के टुकड़े हुए जाते थे। सात दिनों तक उसने दाने की सूरत तक ना देखी। दिन भर जेठ की धूप में काम करता और रात को मुँह लपेट कर सो रहता। इस भीषण वेदना और दुस्सह्कष्ट ने रक्त को जला दिया, मांस और माझा को घुला दिया।बीमार पड़ा तो महिनों घाट से न उठा। अब गुजर बसर कैसे हो?


पांच बीघे के आधे रह गए, एक बैल रह गया, खेती क्या खाक होती?


अंत को यहाँ तक नौबत पहुंची की खेती केवल मर्यादा रक्षा का साधन मात्र रह गई। जीविका का भार मजूरी पर आ पड़ा। सात वर्ष बीत गए, 1 दिन शंकर मजूरी करके लौटा तो राह में विप्रजी ने टोक कर कहा शंकर कल आ कर के अपने बीज बैंक का हिसाब कर ले।तेरे यहाँ 5.5 मन गेहूं कब के बाकी पड़े हुए हैं और तू देने का नाम नहीं लेता?


हजम करने का मन है क्या?


शंकर ने चकित हो कर कहा मैंने तुमसे कब गेहूं लिए थे, जो 5.5 मन हो गए, तुम भूलते हो मेरे यहाँ किसी का छटाक भर न अनाज है ना एक पैसा उधार विप्र इसी नियत का तो ये फल भोग रहे हो की खाने को नहीं जुड़ता।यह कहकर विप्रजी ने उस सवा शेर गेहूं का जिक्र किया जो आज के सात वर्ष पहले शंकर को दिए थे। शंकर सुनकर अवाक रह गया। ईश्वर मैंने इन्हें कितनी बार खलिहानी दी?


इन्होंने मेरा कौन सा काम किया?


जब पोती पत्र देखने शायद शगुन विचारने द्वार पर आते थे, कुछ ना कुछ दक्षिणा ले ही जाते थे, इतना स्वार्थ सवा शेर अनाज को अंडे की भांति सेकर आज यह पिशाच खड़ा कर दिया।जो मुझे निगल जाएगा। इतने दिनों में एक बार भी कह देते तो मैं गेहूं तौल कर दे देता। क्या इसी नियत से चुप साध बैठे रहे?


बोला महाराज नाम लेकर तो मैंने उतना अनाज नहीं दिया पर कई बार खलिहानों में सेर सेर दो दो शेर दिया हैं। अब आप आज 5.5 मन मांगते हैं, मैं कहाँ से दूंगा?


विप्र लेखा जॉर्जो बक्सी 100 100तुमने जो कुछ दिया होगा उसका कोई हिसाब नहीं, चाहे एक की जगह चार पसेडी दे दो, तुम्हारे नाम बही में 5.5 मन लिखा हुआ हैं, जिसे चाहे हिसाब लगवा लो दे दो तो तुम्हारा नाम छेक दो, नहीं तो और भी बढ़ता रहेगा। शंकर पाण्डेय क्यों एक गरीब को सताते हो?


मेरे खाने का ठिकाना नहीं इतना गेंहू की इसके घर से लाऊंगा विप्र जिसके घर से चाहे लाओ मैं छटाक भर भी न छोडूंगा, यहाँ न दोगे।भगवान के घर तो दोगे, शंकर काँप उठा, हम पढ़े लिखे आदमी होते तो कह देते अच्छी बात हैं, ईश्वर के घर ही देंगे वहाँ की तौल यहाँ से कुछ बड़ी तो ना होगी। कम से कम इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं, फिर उसकी क्या चिंता?


किन्तु शंकर इतना तार्किक, इतना व्यवहार चतुर ना था। एक तो आन वह भी ब्राह्मण का बही में नाम रह गया तो सीधे नरक में जाऊंगा। इस ख्याल ही से उसे रोमांच हो गया। बोलामहाराज तुम्हारा जितना होगा यही दूंगा ईश्वर के यहाँ क्यों दूँ, इस जनम में तो ठोकर खा ही रहा हूँ, उस जनम के लिए क्यों काटे बहू?


मगर ये कोई न्याव नहीं हैं तुमने राई का पर्वत बना दिया ब्राह्मण हो के तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था उसी घड़ी तगादा करके ले लिया होता तो आज मेरे सिर पर इतना बड़ा बोझ क्यों पड़ता?


मैं तो दे दूंगा लेकिन तुम्हे भगवान के यहाँ जवाब देना पड़ेगा विप्र वहाँ का डर तुम्हे होगा।मुझे क्यों होने लगा?


वहाँ तो सब अपने ही भाई बंधु हैं आशिमुनि सब तो ब्राह्मण ही हैं, देवता ब्राह्मण हैं, जो कुछ बने, बिगड़ेगी, संभाल लेंगे तो कब देते हो?


शंकर मेरे पास रखा तो हैं नहीं, किसी से मांग कर लाऊंगा तभी ना दूंगा विप्री मैं ये ना मानूंगा 7 साल हो गए अब 1 दिन का भी मुलाही जाना करूँगा। गेहू नहीं दे सकते तो दस्तावेज लिख दो। शंकर मुझे तो देना हैं।चाहे गेहू लो चाहे दस्तावेज दिखाओ, किस हिसाब से दाम रखोगे?


विप्र बाजार भाव पांच शेर का है तो मैं 5.25 शेर का काट दूंगा। शंकर जब दे ही रहा हूँ तो बाजार भाव काटूँगा पांव भर छुड़ाकर क्यों दोषी बनु?


हिसाब लगाया तो गेहूं के दाम 60 हुए 60 का दस्तावेज लिखा गया। तीन सैकड़े सूद साल भर में ना देने पर।सूद की दर ढ़ाई रुपए सेकड़े आठ आने का स्टाम्प चार आने दस्तावेज की तहरीर शंकर को ऊपर से देनी पड़ी। गांव भर ने विपरीत की निंदा की, लेकिन मुँह पर नहीं। महाजन से सभी का काम पड़ता है। उसके मुँह कौन आये?


शंकर ने साल भर तक कठिन तपस्या की मियाद के पहले रुपया अदा करने का उसने रक्षा कर लिया। दोपहर को पहले भी चूल्हा न जलता था, चबने पर बसर होती थी।अब वह भी बंद हुआ। केवल लड़के के लिए रात को रोगियों रख दी जाती। पैसे रोज़ का तम्बाकू पी जाता था। यही एक व्यसन था जिसका वह कभी ना त्याग कर सका था। अब वह व्यसन भी इस कठिन व्रत की भेंट हो गया। उसने चिलम पटक दी, हुक्का तोड़ दिया और तम्बाकू की हाड़ी चूर चूर कर डाली। कपड़े पहले भी त्याग की चरम सीमा तक पहुँच चूके थे। अब वह प्रकृति की न्यूनतम रेखाओं में अभद्र हो गए।शिशिर की अस्त वेदक शीत को उसने आग ताप कर काट दिया। इस संकल्प का फल आशा से बढ़कर निकला। साल के अंत में उसके पास 60 रुंडा जमा हो गए। उसने समझा पंडित जी को इतने रुपए दे दूंगा और कहूंगा महाराज बाकी रुपए भी जल्द ही आपके सामने हाजिर करूँगा। 15। ये तो और बात हैं, क्या पंडित जी इतना भी ना मानेंगे?


उसने रुपए लिए और ले जाकर पंडित जीके चरण कमलों पर अर्पण कर दिए।पंडित जी ने विस्मित होकर पूछा किसी से उधार लिए क्या?


शंकर नहीं महाराज आपके 80 से आपकी मजूरी अच्छी मिली विप्र लेकिन यहाँ तो ₹60 ही हैं, शंकर हाँ महाराज इतने अभी ले लीजिये, बाकी मैं दो तीन महीने में दे दूंगा मुझे उरीण कर दीजिये विप्र उरीण तो जब ही होंगे जब की मेरी कौड़ी कौड़ी चुका दोगे, जा कर मेरे ₹15 और लाओ शंकर महाराज।इतनी दया करो अब सांज की रोगियों का भी ठिकाना नहीं हैं। गांव में हूँ तो कभी ना कभी दे ही दूंगा। विप्र मैं ये रोग नहीं पालता। मैं बहुत बाते करना जानता हूँ। अगर मेरे पूरे रुपए न मिलेंगे तो आज से ₹3 सैकड़े का ब्याज लगेगा। अपने रुपए चाहे अपने घर में रखो चाहे मेरे यहाँ छोड़ जाओ शंकर अच्छा जितना लाया हूँ उतना रख लीजिये मैं जाता हूँ कही से और लाने की फिक्र करता हूँ।शंकर ने सारा गांव छान मारा मगर किसी ने रुपया ना दिए इसलिए नहीं की उसका विश्वास ना था या किसी के पास रुपया ना थे बल्कि इसलिए की पंडित जीके शिकार को छेड़ने की किसी की हिम्मत ना थी। क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया नैसर्गिक नियम हैं। शंकर साल भर तक तपस्या करने पर भी जब आरण से मुक्त होने में सफल ना हो सका।तो उसका संयम निराशा के रूप में परिणत हो गया। उसने समझ लिया की जब इतना कष्ट सहने पर भी साल भर में साफ ये उससे अधिक न जमा कर सका तो अब और कौन सा उपाय हैं जिसके द्वारा इसके दूने रुपये जमा हो। जब सिर पर आण का बोझ ही लादना हैं तो क्या मन भर का और क्या सभा मन का उसका उत्साह क्षीण हो गया। मेहनत से घृणा हो गई। आशा, उत्साह की जननी हैं, आशा में तेज हैं, बल हैं, जीवन हैं।आशा ही संसार की संचालक शक्ति है। शंकर आशाहीन होकर उदासीन हो गया। वह जरूरतें जिनको उसने साल भर तक टाल रखा था, अब द्वार पर खड़ी होने वाली भिखारनी ना थी बल्कि छाती पर सवार होने वाली पिशाचनिया थी जो अपनी भेंट लिए बिना जान नहीं छोड़ती। कपड़ों में चकत्तियों की लगने की भी एक सीमा होती है। अब शंकर को चिट्ठा मिलता तो वह रुपये जमा ना करता, कभी कपड़े लाता, कभी खाने की कोई वस्तु।जहाँ पहले तम्बाकू ही पिया करता था, वहाँ अब गांजे और चरस का चस्का भी लगा। उसे अब रुपये अदा करने की कोई चिंता ना थी मानो उसके ऊपर किसी का एक पैसा भी नहीं आता। पहले जोड़ी छड़ी होती थी पर वह काम करने अवश्य जाता था। अब काम पर न जाने के लिए बहाना खोजा करता। इस भांति तीन वर्ष निकल गए। विप्रजी महाराज ने एक बार भी तकाजा ना किया। वह चतुर्शिकारी की भांतिअचूक निशाना लगाना चाहते थे। पहले से शिकार को चौंकाना उनकी नीती के विरुद्ध था। 1 दिन पंडित जी ने शंकर को बुलाकर हिसाब दिखाया। सर पहिये जो जमा थे वो मिना करने पर अभी शंकर के जिम्मेदार 120 पहिये एक निकले शंकर इतने रुपए तो उसी जन्म में दूंगा, इस जन्म में नहीं हो सकते विप्र मैं इसी जन्म में लूँगा मूल ना सही सूत तो देना ही पड़ेगा। शंकर एक बैल हैं, वह ले लीजिए।और मेरे पास रखा क्या है?


विप्र मुझे बैल बदिया ले कर क्या करना है मुझे देने को तुम्हारे पास बहुत कुछ है शंकर और क्या है महाराज विप्र कुछ है तुम तो हो आखिर तुम भी कही मजूरी करने जाते ही हो। मुझे भी खेती के लिए मजबूर रखना ही पड़ता है। सूद में तुम हमारे यहाँ काम किया करो, जब सुभीता हो, मूल को दे देना।सच तो यूँ हैं की अब तुम किसी दूसरी जगह काम करने नहीं जा सकते। जब तक मेरे रुपये नहीं चूका दो, तुम्हारे पास कोई जायदाद नहीं हैं इतनी बड़ी गठरी में किस एतबार पर छोड़ दू?


कौन इसका जिम्मा लेगा की तुम मुझे महीने महीने सूद देते जाओगे और कही कमा कर जब तुम मुझे सूद भी नहीं दे सकते तो मूल की कौन कहे?


शंकर महाराज सूद में तो काम करूँगा और खाऊंगा क्या विप्रत?


तुम्हारी घरवाली है, लड़के हैं क्या वे हाथ पांव कटा के बैठेंगे रहा मैं तुम्हे आधा शेर जो रोज़ कलेवा के लिए दे दिया करूँगा ओढ़ने कुशाल में एक कम्बल पा जाओगे, एक मिरज्य भी बनवा दिया करूँगा और क्या चाहिए?


ये सच है की और लोग तुम्हे छह आने देते हैं, लेकिन मुझे ऐसी गरज नहीं है। मैं तो तुम्हे रुपये भरने के लिए रखता हूँ। शंकर ने कुछ देर तक गहरी चिंता में पड़े रहने के बाद कहा महाराज यह तो जन्म भर की गुलामी हुई।विप्र गुलामी समझो चाहे मजूरी समझो मैं अपने रुपये भराए बिना तुमको कभी ना छोडूंगा तुम भागोगे तो तुम्हारा लड़का भरेगा। हाँ जब कोई ना रहेगा तब की बात दूसरी हैं। इस निर्णय की कही अपील ना थी। मजूर की जमानत कौन करता, कही शरण ना थी, भाग कर कहा जाता।दूसरे दिन से उसने विप्रजी के यहाँ काम करना शुरू कर दिया। सवा शेर गेहूं की बदौलत उम्र भर के लिए गुलामी की बेड़ी पैरों में डालनी पड़ी। उस अभागे को अब अगर किसी विचार से संतोष होता था तो ये था की वह मेरे पूर्व जन्म का संस्कार है। स्त्री को वे काम करने पड़ते थे जो उसने कभी ना किये थे। बच्चे दानों को तरसते थे लेकिन शंकर चुपचाप देखने के सिवा और कुछ ना कर सकता था।वह गेहूं के दाने किसी देवता के शाप की भांति आवत जीवन उसके सिर से ना उतरे। शंकर ने विप्रजी के यहाँ 20 वर्ष तक गुलामी करने के बाद इस दुसार संसार से प्रस्थान किया। 120 अभी तक उसके सिर पर सवार थे। पंडित जी ने उस गरीब को ईश्वर के दरबार में कष्ट देना उचित ना समझा। इतने अन्यायी इतने निर्दयी ना थे उसके जवान, बेटे की गर्दन पकड़ी आज तक वह विप्रजी के यहाँ काम करता है।उसका उद्धार कब होगा?


होगा भी या नहीं?


ईश्वर ही जाने पाठक इस वृतांत को कपोल कल्पित न समझिए। ये सत्य घटना है ऐसे शंकरों और ऐसे विप्रो से दुनिया खाली नहीं है। आप सुन रहे थे?


मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी सवा सेर गेहूं।


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