घरजमाई - मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Ghar Jamai - A Story by Munshi Premchand || 📎👇
और सबसे बढ़कर अपनी स्त्री की निष्ठुरता ने उसके हृदय के टुकड़े कर दिए थे। वह बैठी यह फटकार सुनती रही पर एक बार भी तो उसके मुँह से ना निकला।अम्मा तुम क्यों इनका अपमान कर रही हो?
बैठी गट गट सुनती रही। शायद मेरी दुर्गति पर खुश हो रही थी। इस घर में वह कैसे जाए?
क्या फिर वही गालियां खाने, वही फटकार सुनने के लिए और आज इस घर में जीवन के 10 साल गुजर जाने पर यह हाल हो रहा है?
मैं किसी से कम काम नहीं कहता हूँ। दोनों साले मीठी नींद सोते रहते हैं और मैं बैलों को सानी पानी देता हूँ। छाटी काटता हूँ।वहाँ सब लोग पल पल पर चिलम पीते हैं। मैं आँखें बंद किए अपने काम में लगा रहता हूँ। संध्या समय पर घरवाले गाने बजाने चले जाते हैं। मैं घड़ी रात तक गाय भैंसे धोता हूँ। उसका ये पुरस्कार मिल रहा हैं की कोई खाने को भी नहीं पूछता। उलटे और गालिया मिलती हैं। उसकी स्त्री घर से डोल लेकर निकली और बोली ज़रा इसे कुंए से खींच लो, एक बूंद पानी नहीं हैं। हरिधन ने डोल लिया और कुंए से पानी भर लाया।उसे ज़ोर से भूख लगी उठा समझा अब खाने को बुलवाने आएगी, मगर स्त्री डोल लेकर अंदर गई तो वहीं की हो रही हरिधन थका मादा सुधा से व्याकुल पड़ा सो रहा सहसा उसकी स्त्री गुमानी ने आकर उसे जगाया। हरिधन में पड़े पड़े ही कहा क्या हैं, क्या पड़ा भी ना रहने देगी या और पानी चाहिए गुमानी कटू स्वर में बोली, गुजराती क्यों हो?
खाने को बुलवाने आई हो।हरिधन ने देखा उसके दोनों साले और बड़े साले के दोनों लड़के भोजन किये चले जा रहे हैं। उसकी देह में आग लग गई। मेरी अब ये नौबत पहुँच गई की इन लोगों के साथ बैठ कर खा भी नहीं सकता। मैं इनकी झूठी थाली चाटने वाला हूँ। मैं इनका कुत्ता हूँ जिसे खाने के बाद टुकड़ा रोटी डाल दी जाती हैं। यही घर हैं जहा आज से 10 साल पहले उसका कितना आदर सत्कार होता था। साले गुलाम बने रहते थे।सास मुँह जोती रहती थी, स्त्री पूजा करती थी तब उसके पास रुपए थे, जायदाद थी, अब वह दरिद्र हैं। उसकी सारी जायदाद को इन्हीं लोगों ने कूड़ा कर दिया। अब रोगियों के भी लाले हैं। उसके जीने एक ज्वाला सी उठी की इसी वक़्त अंदर जाकर सास को और साली को भिगो भिगो कर लगाय पर जब्त करके रह गया। पड़े पड़े बोला मुझे भूख नहीं हैं आज ना खाऊंगा घुमानी ने कहा ना खाओगे मेरी बला से, हाँ नहीं तो।खाओगे तुम्हारे ही पेट में जायेगा कुछ मेरे पेट में थोड़े ही जायेगा हरि धन का क्रोध आंसू बन गया ये मेरी स्त्री हैं जिसके लिए मैंने अपना सर्वस्व मिट्टी में मिला दिया मुझे उल्लू बनाकर ये सब मुझे अब निकाल देना चाहते हैं वह अब कहाँ जाये, क्या करे उसकी सास आकर बोली चल कर खा क्यों नहीं लेते जी रूठ ते किस पर हो यहाँ तुम्हारे नखरे सहने का किसी में बूता नहीं हैं जो देते हैं।वह मत देना और क्या करोगे तुम से बेटी ब्याह ही हैं, कुछ तुम्हारी जिंदगी का ठेका नहीं लिया हैं। हरिधन ने मर्माहत हो कर कहा, हाँ, अम्मा मेरी भूल थी की मैं यही समझ रहा था, अब मेरे पास क्या हैं की तुम मेरी जिंदगी का ठेका लोगी। जब मेरे पास धन भी था तब सब कुछ आता था, अब दरिद्र हूँ, तुम क्यों बात पूछोगी बूढ़ी सास भी मुँह फुला कर भीतर चली गई।बच्चो के लिए बाप एक फालतू सी चीज़, एक विलास की वस्तुध हैं। जैसे घोड़े के लिए चने या बाबुओं के लिए मोहन भोग, मोहन भोग उम्र भर न मिले तो किसका नुक्सान हैं?
मगर 1 दिन रोटी दाल के दर्शन न हो तो फिर देखिये क्या हाल होता हैं पिता के दर्शन कभी कभी शाम सवेरे हो जाते हैं। वो बच्चे को उछलता हैं, दुलारता हैं, कभी गोद में लेकर या ऊँगली पकड़ कर सैर कराने ले जाता हैं और बसये ही उसके कर्तव्य की इति हैं। वह परदेश चला जाये, बच्चे को परवाह नहीं होती, लेकिन माँ तो बच्चे का सर्वस्व हैं, बालक 1 मिनट के लिए भी उसका वियोग नहीं सह सकता। पिता कोई हो उसे परवाह नहीं। केवल एक उछालने कुदाने वाला आदमी होना चाहिए, लेकिन माता तो अपनी होनी चाहिए। 16। हो आने अपनी वही रूप, वही रंग, वही प्यार, वही सब कुछ वह अगर नहीं हैंतो बालक के जीवन का स्रोत मानो सूख जाता है। फिर वह शिव का नंदी है पर फूल या जल चढ़ाना लाजमी नहीं अख्त्यारी है। हरि धन की माता का आज 10 साल हुए देहांत हो गया था। उस वक्त उसका विवाह हो चुका था। वह 16 साल का कुमार था पर माँ के मरते ही उसे मालूम हुआ कि मैं कितना निस्सहाय हूँ जैसे उस घर पर उसका अधिकार ही ना रहा हो। बहनों के विवाह हो चूके थे।भाई कोई दूसरा ना था बेचारा अकेले घर में जाते भी डरता था माँ के लिए रोता था पर माँ की परछाई से डरता था जीस कोठरी में उसमें देह त्याग किया था, उधर आँखे तक न उठा था घर में एक बुआ थी वह हरिधन को बहुत दुलार करती हरिधन को अब दूध ज्यादा मिलता, काम भी कम करना पड़ता बुआ बार बार पूछती बेटा कुछ खाओगे?
बाप भी अब उसे ज्यादा प्यार करते।उसके लिए अलग एक गाय मंगवा दी। कभी कभी उसे कुछ पैसे देते की जैसे चाहे खर्च करे। पर इन मरहमों से वह घाव ना पूरा होता था, जिसने उसकी आत्मा को आहट कर दिया था। वह दुलार और प्यार बार बार माँ की याद दिलाता माँ की घुड़कियों में जो मज़ा था, वह क्या इस दुलार में था?
माँ से मांग कर, लड़कर ठुनक कर रूठकर लेने में जो आनंद था वह क्या भिक्षा दान में था?
पहले वह सवस्थ था।मांग मांग कर खाता था लड़ लड़ कर खाता। अब वह बीमार था, अच्छे से अच्छे पदार्थ उसे दिए जाते थे पर भूख न थी। साल भर तक वह इसी दशा में रहा। फिर दुनिया बदल गई। एक नई स्त्री जिसे लोग उसकी माता कहते थे उसके घर में आई और देखते देखते एक काली घटा की तरह उसके संकुचित भूमंडल पर छा गई। सारी हरियाली।सारे प्रकाश पर अंधकार का पर्दा पड़ गया। हरिधन ने इस नकली माँ से बात तक न की, कभी उसके पास न गया तक नहीं। 1 दिन घर से निकला और ससुराल चला आया। बाप ने बारबार बुलाया पर उसके जीते जी वह फिर उस घर में न गया। जीस दिन उसके पिता के देहांत की सूचना मिली। उसे एक प्रकार का ईर्ष्यामय हर्ष हुआ। उसकी आँखों में आंसू की एक बूंद भी न आई।इस नए संसार में आकर हरिधन को एक बार फिर मातृ स्नेह का आनंद मिला। उसकी सास ने आशी वरदान की भांति उसके शून्य जीवन को विभूतियों से परिपूर्ण कर दिया। मरुभूमि में हरियाली उत्पन्न हो गई। सालियों की चुहल में, सास के स्नेह में, सालों के वाक विलास में और स्त्री के प्रेम में उसके जीवन की सारी आकांक्षाएं पूरी हो गई। सास कहती बेटा।तुम इस घर को अपना ही समझो, तुम ही मेरी आँखों के तारे हो। वह उससे अपने लड़कों की बहुओं की शिकायत करती। वह दिल में समझता था। असा जी मुझे अपने बेटों से भी ज्यादा चाहती हैं। बाप के मरते ही वह घर गया और अपने हिस्से की जायदाद को कूड़ा करके रुपयों की थैली लिए फिर आ गया। अब उसका दूना आदर सत्कार होने लगा।उसने अपनी सारी सम्पत्ति सास के चरणों पर अर्पण कर के अपने जीवन को सार्थक कर दिया। अब तक उसे कभी कभी घर की याद आ जाती थी। अब भूल कर भी उसकी याद ना आती मानो वह उसके जीवन का कोई भीषण कांड था, जिसे भूल जाना ही उसके लिए अच्छा था। वह सबसे पहले उठता सबसे ज्यादा काम करता, उसका मनोयोग, उसका परिश्रम देख कर गांव के लोग दांतों ऊँगली दबाते थे।उसके ससुर का भाग्य बखारते जिसे ऐसा दामाद मिल गया, लेकिन ज्यों ज्यों दिन गुजरते गए उसका मान सम्मान घटता गया। पहले देवता था फिर घर का आदमी। अंत में घर का दास हो गया। रोगियों में भी बाधा पड़ गई, अपमान होने लगा। अगर घर के लोग भूख को मरते और साथ ही उसे भी मरना पड़ता तो उसे ज़रा भी शिकायत ना होती। लेकिन जब वह देखता और लोग मूछों पर ताव दे रहे हैं।केवल मैं ही दूध की मक्खी बना दिया गया हूँ तो उसके अंतस्थल से एक लंबी ठंडी आह निकल जाती। अभी उसकी उम्र कुछ 25 साल की तो थी, इतनी उम्र इस घर में कैसे गुजरेगी?
और तो और उसकी स्त्री ने भी आँखें फेर ली। यह उस विपत्ति का सबसे क्रूर दृश्य था। हरिधन तो उधर भूखा प्यासा चिंता दा में जल रहा था। इधर घर में सासी और दोनों सालों में बाते हो रही थी।गुमानी भी हाँ में हाँ मिलाती जाती थी। बड़े साले ने कहा हम लोगों की बराबरी करते हैं, ये नहीं समझते की किसी ने उसकी जिंदगी भर का बीड़ा थोड़े ही लिया हैं। 10 साल हो गए इतने दिनों में क्या 23000 में हड़प गए होंगे?
छोटे साले ने कहा मजूर हो तो आदमी घुरके भी डांटे भी। अब इनसे कोई क्या कहे?
न जाने इनसे कप पैंट छूटेगा भी या नहीं, अपने दिल में समझते होंगे।मैंने ₹2000 नहीं दिए हैं, ये नहीं समझते हैं की उनके ₹2000 कब के उड़ चूके हैं?
सवा सेर तो 1 जून को चाहिए। सास गंभीर भाव से बोली बड़ी भारी खुराक हैं। गुमानी माता के सिर से जू निकल रही थी। सुलगते हुए हृदय से बोली निकम्मे आदमी को खाने के सिवा और काम ही क्या रहता हैं?
बड़े खाने की कोई बात नहीं हैं। जीसको जितनी भूख हो उतना खाये।लेकिन कुछ पैदा करना चाहिए ये नहीं समझते की में किसी के दिन कटे हैं छोटे मैं तो 1 दिन कह दूंगा अब आप अपनी राह लीजिये, आपका कर्जा नहीं खाया हैं। गुमानी घर वालो की ऐसी ऐसी बाते सुन कर अपने पति से द्वेष करने लगी थी। अगर वो बाहर से चार पैसे लाता तो इस घर में उसका कितना मान सम्मान होता, वो अभी रानी बन कर रहती।न जाने क्यों कही बहार जाकर कमाते उसकी नानी मरती हैं गुमानी की मनोवृत्तियाँ अभी तक बिलकुल बालपन की सी थी उसका अपना कोई घर न था उसी घर का हिता हित उसके लिए भी प्रधान था। वह भी उन्हीं शब्दों में विचार करती इस समस्या को उन्हीं आँखों से देखती जैसे उसके घर वाले देखते थे। सच तो हैं ₹2000 में क्या किसी को मोल ले लेंगे?
10 साल में ₹2000 होते ही क्या हैं?
200 ही तो साल भर के हुए क्या दो आदमी साल भर में 200 भी ना खायेंगे?
फिर कपड़े, लत्ते दूध ही सब कुछ तो हैं। 10 साल हो गए, एक पीतल का छल्ला नहीं बना, घर से निकलते तो जैसे इनके प्राण निकलते हैं, जानते हैं जैसे पहले पूजा होती थी वैसे ही जन्म भर होती रहेंगी। ये नहीं सोचते की पहले और बात थी, अब और बात हैं।बहू पहले ससुराल जाती हैं तो उसका कितना महान होता हैं। उसके डोली से उतरते ही बाजे बजते हैं, गांव मोहल्ले की औरते उसका मुँह देखने आती हैं और रुपये देती हैं। महीनों उसे घर भर से अच्छा खाने को मिलता हैं। अच्छा पहनने को कोई काम नहीं लिया जाता, लेकिन छह महीने बाद कोई उसकी बात भी नहीं पूछता। वह घर भर की लौडी हो जाती हैं उनके घर में मेरी तो वही गति होती फिर काहे चोरोन?
जो ये कहो की मैं तो काम करता हूँ तो तुम्हारी भूल है मजूर और बात है, उसे आदमी डांटता भी है, मारता भी है जब चाहता है रखता है जब जी चाहता है निकाल देता है, कस कर काम लेता है ये नहीं की जब जी में आया कुछ काम किया जब जी में आया पढ़ कर सो रहे हरिधन भी पड़ा, अंदर ही अंदर सुलग रहा था की दोनों साले बाहर आए और बड़े साहब बोले भैया उठोतीसरा पहर ढल गया।कब तक सोते रहोगे?
सारा खेत पड़ा है हरिधन छट से उठ बैठा और तीव्र स्वर में बोला, क्या तुम लोगों में मुझे उल्लू समझ लिया है?
दोनों साले हक्का बक्का हो गए। जीस आदमी ने कभी जबान नहीं खोली। हमेशा गुलामों की तरह हाथ बांधे हाजिर रहा। वह आज एकाएक इतना आत्मा भिमानी हो गया। ये उनको चौंका देने के लिए काफी था। कुछ जवाब ना सूझा।हरिधन ने देखा इन दोनों के कदम उखड़ गए हैं तो एक धक्का और देने की प्रबल इच्छा को न रोक सका। उसी ढंग से बोला मेरी भी आँखें हैं अंधा नहीं हो ना बहेरा ही हो, छाती फाड़ कर काम करू और उस पर भी कुत्ता समझा जाऊं। ऐसे गद्दे कहीं और होंगे अब बड़े साले भी गर्म पड़े तुम्हे किसी ने यहाँ बांध तो नहीं रखा है?
अब की हरिधन लाजवाब हुआ, कोई बात न सूझे। बड़े ने फिर उसी ढंग से कहा अगर तुम यह चाहो की जन्म भर पाहुँ ने बने रहो और तुम्हारा वैसा ही आदर सत्कार होता रहेस तो हमारे बस की बात नहीं हैं हरिधन ने आँखें निकाल कर कहा क्या मैं तुम लोगों से कम काम करता हूँ बड़े ये कौन कहता हैं हरिधन?
तो तुम्हारे घर की यही नीती हैं की जो सबसे ज्यादा काम करे, वही को मारा जाये। बड़े तुम खुद खाने नहीं गए, क्या कोई तुम्हारे मुँह में डाल देता?
हरिधन ने होठ चबाकर कहा मैं खुद खाने नहीं गया। कहते तुम्हे लाज नहीं आती नहीं आई थी बहन तुम्हे बुलवाने हरिधन की आँखों में खून उतर गया, दांत पीस कर रह गया। छोटे साले ने कहा अम्मा भी आई थी?
तुमने कह दिया मुझे भूख नहीं हैं तो क्या करती?
सास भीतर से लपकी चली आ रही थी। ये बात सुनकर बोली कितना कहकर हार गई, कोई उठे ना तो मैं क्या करू हरिधन ने विष खून और आग से भरे हुए स्वर में कहा मैं तुम्हारे लड़कों का झूठा खाने के लिए हूँ, मैं कुत्ता हूँ की तुम लोग खाकर मेरे सामने रुकी रोटी का टुकड़ा फेक दो बुढ़िया ने हटकर कहा।तो क्या तुम लड़कों की बराबरी करोगे?
हरिधन परास्त हो गया। बुढ़िया के एक ही वाग प्रहार ने उसका का काम तमाम कर दिया। उसकी तनी हुई भवे ढीली पड़ गई। आँखों की आग बूझ गई, फड़कते हुए नखने शांत हो गए। किसी आहत मनुष्य की भांति वह जमीन पर गिर पड़ा। क्या तुम मेरे लड़कों की बराबरी करोगे?
ये वाक्य एक लंबे भाले की तरह उसके हृदय में चुभता चला जाता था।ना हृदय का अंत था, ना उस भाले का सारे धरने खाया पर हरिधर न उठा सास ने मनाया, सालियों ने मनाया ससुर ने मनाया दोनों साले मनाकर हार गए हरिधर न उठा वहा द्वार पर एक डांट पड़ा था, उसे उठाकर सबसे अलग कुंए पर ले गया और जगत पर बिछाकर पड़ा रहा। रात भीग चुकी थी। अनंत आकाश में उज्ज्वल तारे बालकों की भांति क्रीड़ा कर रहे थे।कोई नाचता था, कोई उछलता था, कोई हंसता था, कोई आँखें मींच कर फिर खोल देता था, रह रह कर कोई साहसी बालक सपाटा भर कर एक पल में उस विस्तृत क्षेत्र को पार कर लेता था और न जाने कहाँ छा जाता था। हरिधन को अपना बचपन याद आया जब वह भी इसी तरह क्रेड़ा करता था। उसकी बाल स्मृतियों उन्हीं चमकीले तारों की भांति प्रज्वलित हो गई। वह अपना छोटा सा घरवह आम का बाग जहाँ वह केरियां चुना करता था, वह मैदान जहाँ कबड्डी खेला करता था। शव उसका याद आने लगे। फिर अपनी स्नेहमयी माता की सदैव मूर्ति उसके सामने खड़ी हो गई। उन आँखों में कितनी करुणा थी, कितनी दया थी, उसे ऐसा जान पड़ा मानो माता की आँखों में आंसू भरे, उसे छाती से लगा लेने के लिए हाथ फैलाए उसकी ओर चली आ रही है।वह उस मधुर भावना में अपने को भूल गया। ऐसा जान पड़ा मानू माता ने उसे छाती सता लिया हैं और उसके सिर पर हाथ फेर रही हैं। वह रोने लगा, फूट फूट कर रोने लगा। उसी आत्मसमोहित दशा में उसके मुँह से यह शब्द निकले अम्मा तुमने मुझे इतना भुला दिया, देखो तुम्हारे प्यारेलाल की क्या दशा हो रही हैं, कोई उस पानी को भी नहीं पूछता।क्या जहा तुम हो वहा मेरे लिए जगह नहीं हैं?
सहसा गुमानी ने आकर पुकारा, क्या सो गए?
तुम ऐसी भी क्या राक्षसी नींद चलकर खा क्यों नहीं लेते?
कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे?
हरिधन उस कल्पना जगत से क्रूर प्रत्यक्ष में आ गया। वही कुएं की जगत थी, वही फटा हुआ टाट और गुमानी सामने खड़ी कह रही थी कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे हरिधन उठ बैठा।और मानू तलवार म्यान से निकाल कर बोला, भला तुम्हे मेरी सुध तो आई, मैंने कह तो दिया था मुझे भूख नहीं हैं गुमानी तो कितने दिन तक ना खाओगे, अब इस घर का पानी भी ना पियूंगा तुझे मेरे साथ चलना हैं या नहीं?
दृढ़ संकल्प से भरे हुए इन शब्दों को सुनकर गुमानी सहम उठी, बोली कहा जा रहे हो हरि धन ने मानो नशे में कहा।तुझे इससे क्या मतलब?
मेरे साथ चलेगी या नहीं?
फिर पीछे से ना कहना मुझसे कहा नहीं घुमानी आपत्ति के भाव से बोली तुम बताती क्यों नहीं कहा जा रहे हो?
तू मेरे साथ चलेगी या नहीं?
जब तक बता ना दोगे मैं ना जाऊंगी तो मालूम हो गया तू नहीं जाना चाहती। मुझे इतना ही पूछना था, नहीं तो अब तक मैं आंधी दूर निकल गया होता।ये कह कर उठा और अपने घर की ओर चला गुमानी पकारती रही, सुन लो सुन लो पर उसने फिर कर भी ना देखा। 30 मील की मंजिल हरिधन ने पांच घंटों में तय की। जब वो अपने गांव की अमराइयों के सामने पहुंचा तो उसकी मातृ भावना उषा की सुनहरी गोद में खेल रही थी। उन वृक्षों को देख कर उसका बिहवल ह्रदय नाचने लगा। मंदिर का सुनहरा कलश देख करवह इस तरह दौड़ा मानो एक छलांग में उसके ऊपर जा पहुंचेगा। वह वेग में दौड़ा जा रहा था मानो उसकी माता गोद फैलाये उसे बुला रही हो। जब वह आमो के बाग में पहुंचा जहाँ डालियों पर बैठकर वह हाथी की सवारी का आनंद पाता था, जहाँ के कच्चे बेरो और लिसोडो में एक स्वर्गीय स्वाद था तो वह बैठ गया और भूमि पर सिर झुका कर रोने लगा।मानो अपनी माता को अपनी विपत्ति कथा सुना रहा हो। वहाँ की वायु में वहाँ के प्रकाश में मानो उसकी विराट रूपिणी माता व्याप्त हो रही थी। वहाँ की अंगुल, अंगुल भूमि माता के पद चिन्हो से पवित्र थी। माता के स्नेह में डूबे हुए शब्द अभी तक मानो आकाश में गूंज रहे थे। इस वायु और इस आकाश में न जाने कौन सी संजीवनी थी।जिसने उसकी शोकात्र हृदय को फिर बालोतसाह से भर दिया। वह एक पेड़ पर चढ़ गया और अंधर से आम तोड़ तोड़ कर खाने लगा। सास के वह कठोर शब्द स्त्री का वह निष्ठुर आघात, वह सारा अपमान उसे भूल गया। उसके पांव फूल गए थे, तलवों में जलन हो रही थी पर इस आनंद में उसे किसी बात का ध्यान ना था। सहसा रखवाले ने पुकारा, वह कौन ऊपर चढ़ा हैं रे?
उतर अभी नहीं तो ऐसा पत्थर खींच कर मारूंगा की वही ठंडे हो जाओगे। उसने कई गालियां भी दी। इस फटकार और इन गालियों में इस समय हरिधन को अलौकिक आनंद मिल रहा था। वह डालियों में छिप गया, कई आम काट काट नीचे गिराए और ज़ोर से ठट्टा मार कर हँसा। ऐसी उल्लास से भरी हुई हँसी उसने बहुत दिन से न हँसी थी। रखवाले को ये हँसी परिचित मालूम हुई।मगर हरि धन यहाँ कहा वह ससुराल की रोगियों तोड़ रहा हैं। कैसा हंसोड़ा था कितना चबिला ना जाने बिचारे का क्या हाल हुआ?
पेड़ की डाल से तालाब में कूद पड़ता था। अब गांव में ऐसा कौन हैं?
डांट कर बोला वहाँ से बैठे बैठे हसोगे तो आकर सारी हँसी निकाल दूंगा, नहीं तो सीधे उतर आओ। वह गालियां देते जा रहा था की एक गुठली आकर उसके सिर पर लगे सिर सहलाता हुआ बोला।ये कौन शैतान हैं?
नहीं मानता ठहर दो, मैं आकर तेरी खबर लेता हूँ। उसने अपनी लकड़ी नीचे रख दी और बंदरो की तरह झटपट ऊपर चढ़ गया। देखा तो हरि धन बैठा मुस्कुरा रहा हैं। चकित हो कर बोला, अरे हरि धन तुम यहाँ कब आये, इस पेड़ पर कब से बैठे हो?
दोनों बचपन के सखा वही गले मिले यहाँ कब आये चलो घर चलो भले आदमी।क्या वहा आम भी मयस्सर न होते थे?
हरी धन ने मुस्कुरा कर कहा मंगरू इनामों में जो स्वाद हैं वो और कही के आमो में नहीं हैं, गांव का क्या रंग ढंग हैं?
मंगरू सब चंचन हैं भैया तुमने तो जैसे नाता ही तोड़ दिया। इस तरह कोई अपना गांव घर छोड़ देता हैं। जब से तुम्हारे दादा मरे, साड़ी गृहस्थी चौपट हो गई। दो छोटे छोटे लड़के हैं उनके लिए क्या होता हैं हरी धन?
अब उस गृहस्थी से क्या वास्ता हैं भाई मैं तो अपना ले दे चूका मजूरी तो मिलेंगे ना तुम्हारी गैया ही चरा दिया करूँगा मुझे खाने को दे देना। मंगलू ने अविश्वास के भाव से कहा अरे भैया कैसी बाते करते हो तुम्हारे लिए जान हाजिर हैं क्या?
ससुराल में अब न रहोगे, कोई चिंता नहीं, पहले तो तुम्हारा घर ही हैं, उसे संभालो। छोटे छोटे बच्चे हैं उनको पालो।तुम नई अम्माम से नहाक डरते थे, बड़ी सीधी हैं बेचारी, बस अपनी माँ समझो तुम्हे पाकर तो निहाल हो जाएगी, अच्छा घरवाली को भी तो लाओगे?
हरे धन उसका अब मुँह ना देखूंगा मेरे लिए वह मर गई मंगरू तो दूसरी सगाई हो जाएगी अब की ऐसी मेहरिया ला दूंगा की उसके पैर धो धोकर पियोगे लेकिन कहीं पहले भी आ गई तो हरे धन वह ना आएगी।हरिधन अपने घर पहुंचा तो दोनों भाई भैया आये भैया आये कह कर भीतर दौड़े और माँ को खबर दी। उस घर में कदम रखते ही हरिधन को ऐसी शांत महिमा का अनुभव हुआ मानो वह अपनी माँ की गोद में बैठा हुआ हैं। इतने दिनों ठोकरे खाने से उसका हृदय कोमल हो गया था। जहाँ पहले अभिमान था, आग्रह था, हेकड़ी थी, वहाँ अब निराशा थी, पराजय और याचना थी।बिमारी को ज़ोर कम हो चला था, अब मामूली दवा भी असर कर सकती थी। पहले की दीवारे चित चुकी थी, अब उसमें घुस जाना असाध्य ना था। वही घर जिसे वह 1 दिन विरक्त हो गया था, अब गोद फैलाये उसे आश्रय देने को तैयार था। हरि धन का निर्मलभ मन यह आश्रय पाकर मानो तृप्त हो गया। शाम को वीमाता ने कहा बेटा तुम घर आ गए हमारे धन्य भाग अब इन बच्चों को पालो।माँ का नाता ना सही, बाप का नाता तो है ही मुझे एक रोटी दे देना, खाकर एक कोने में पड़ी रहूंगी तुम अपनी अम्मा से मेरी बहन का नाता है, उस नाते से तुम मेरे लड़के होते हो। हरिधन ने मातृ विवल आँखों से वे माता के रूप में अपनी माता के दर्शन किए। घर के एक एक कोने से मातृ स्मृतियों की छटा चाँदनी की भांति छिटकी हुई थी।वीमाता का प्राण मूक मंडल भी उसी छटा से रंजित था। दूसरे दिन हरि धन फिर कंधे पर हल रखकर खेत को चला। उसके मुख पर उल्लास था और आँखों में गर्व। वह अब किसी का आश्रित नहीं आश्रयदाता था। किसी के द्वार का भिक्षुक नहीं, घर का रक्षक था। 1 दिन उसने सुना, घुमानी ने दूसरा घर कर लिया। माँ से बोला तुमने सुना काकी घुमानी ने घर कर लिया। काकी ने कहाघर क्या कर लेगी?
ठट्टा हैं बिरादरी में ऐसा अधीर पंचायत नहीं अदालत तो हैं हरिधन ने कहा नहीं काकी बहुत अच्छा हुआ ला महावीर जी को लड्डू चढ़ा हूँ मैं तो डर रहा था कहीं मेरे गले ना आ पड़े, भगवान ने मेरी सुन ली मैं वहाँ से यही ठान कर चला था, अब उसका मुँह ना देखूंगा, आप सुन रहे थे।मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी घर जमाई।

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