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नया विवाह - मुंशी प्रेमचंद की लिखी एक प्रेरणादायक कहानी | Naya Vivah - A Story by Munshi Premchand |

 

नया विवाह - मुंशी प्रेमचंद की लिखी एक प्रेरणादायक कहानी | Naya Vivah - A Story by Munshi Premchand | 📎👇

https://youtu.be/VMGgKuvxwiA

मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी " नया विवाह " हमारी देह पुरानी है, लेकिन इसमें सदैव नया रक्त दौड़ता रहता है। नए रक्त के प्रवाह पर ही हमारे जीवन का आधार है। पृथ्वी की इस चिरंतन व्यवस्था में ये नयापन उसके एक एक अनूने एक एक कण में तार में बसे हुए स्वरों की भांति गूंजता रहता है और ये 100 साल की बुढ़िया आज भी नवेली दुल्हन बनी हुई है।जब से लाला डंगामल ने नया विवाह किया है, उनका यौवन नहीं ये सिरे से जाग उठा है। जब पहली स्त्री जीवित थी तब वे घर में बहुत कम रहते थे। रात से 10:11 बजे तक तो पूजा पाठ ही करते रहते थे, फिर भोजन करके दुकान चले जाते। वहाँ से 1:00 बजे रात लौटते और थके मांगते सो जाते। यदि लीला कभी कहती ज़रा और सवेरे आ जाया करो तो बिगड़ जाते और कहते तुम्हारे लिए क्या दुकान छोड़ दूँ?


या रोजगार बंद कर दो। ये वो ज़माना नहीं हैं की एक लोटा जल चढ़ाकर लक्ष्मी प्रसन्न कर ली जाये। आज उनकी चौखट पर माथा लगाना पड़ता हैं तब भी उनका मुँह सीधा नहीं होता। लीला बेचारी चुप हो जाती। अभी छह महीने की बात हैं। लीला को ज्वार चढ़ा हुआ था। लाला जी दुकान जाने लगे तब उसने डरते डरते कहा, हाँ देखो मीरा जी अच्छा नहीं हैं, ज़रा सा सबेरे आ जाना।डंगामल ने पगड़ी उतार कर खूटी पर लटका दी और बोले अगर मेरे बैठे रहने से तुम्हारा जी अच्छा हो जाए तो मैं दुकान में जाऊंगा। लीला हताश होकर बोली मैं दुकान जाने को तो नहीं मना करती, केवल ज़रा सवेरे आने को कहती हूँ तो क्या दुकान पर बैठा मौस क्या करता हूँ लीला इसका क्या जवाब देती?


पति का ये हंसने ही व्यवहार उसके लिए कोई नहीं बात ना थी।इधर कई साल से उसे इसका कठोर अनुभव हो रहा था की उसकी इस घर में कद्र नहीं हैं। वो अक्सर इस समस्या पर विचार भी किया करती पर वह अपना कोई अपराध न पाती। वह पति की सेवा अब पहले से कहीं ज्यादा करती, उनके कार्यभार को हल्का करने की बराबर चेष्टा करती रहती, बराबर प्रसन्नचित्त रहती, कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करती। अगर उसकी जवानी ढल चुकी थी तो इसमें उसका क्या अपराध था?


इसकी जवानी सदैव स्थिर रहती है। अगर अब उसका स्वास्थ्य उतना अच्छा ना था तो इसमें उसका क्या दोष?


उसे बेकसूर क्यों दंड दिया जाता है?


उसे तो ये था की 25 साल का सहचर्य अब एक गहरी मानसिक और आत्मिक अनुरूपता का रूप धारण कर लेता है, जो दोष को भी गुण बना लेता है, जो पके फल की तरह ज्यादा रसीला, ज्यादा मीठा, ज्यादा सुन्दर हो जाता है। लेकिन लाला जी का वणिक ह्रदय।हर एक पदार्थ को वाणिज्य की तराजू से तौलता था। बूढ़ी गाय जब ना दूध दे सकती है, ना बचे तब उसके लिए गोशाला ही सबसे अच्छी जगह है। उनके विचार में लीला के लिए इतना ही काफी था की घर की मालकिन बनी रहे, आराम से खाये और पड़ी रहे उसे अख्तियार है चाहे जीतने जेवर बनवाये चाहे जितना स्नान, वह पूजा करे केवल उनसे दूर रहे। मानव प्रकृति की जटिलता का एक रहस्य यह था।की दंगामल जीस आनंद से लीला को वंचित रखना चाहते थे जिसकी उसके लिए कोई जरूरत ही ना समझते थे। खुद उसी के लिए सदैव प्रयत्न करते रहते थे। लीला 40 वर्ष की होकर बुरी समझ ली गई थी। किन्तु वे 43 के होकर अभी जवान ही थे। जवानी के उन्माद और उल्लास से भरे हुए लीला से अब उन्हें एक तरह की अरुचि होती थी और वह दुखिया जब अपनी त्रुटियों का अनुभव करकेप्रकृति के निर्दयी आघात से बचने के लिए रंग वरोगन की हार लेती, तब लाला जी उसके बूढ़े नखरों से और भी घृणा करने लगते। वे कहते वह हरी कृष्णा सात लड़कों की तो माँ हो गई, बाल खिचड़ी हो गई, चेहरा धुले हुए फला लें की तरह सिकुड़ गया। मगर आपको अभी महावर, सिंदूर, मेहंदी और उबटन की हवस बाकी है। औरतों का स्वभाव भी कितना विचित्र है?


न जाने क्यों बनाव सिंघार पर इतना जान देती हैं पूछो अब तुम्हे और क्या चाहिए क्यों नहीं मन को समझा लेती की जवानी विदा हो गई और इन उपदानों से वह वापस नहीं बुलाई जा सकती, लेकिन वे खुद जवानी का स्वप्न देखते रहते थे। उनकी जवानी की कृष्णा अभी शांत न हुई थी, जारों में रस्सु और पाको का सेवन करते रहते थे।हफ्ते में दो बार की जाब लगाते और एक डॉक्टर से मंकी ग्लांड के विषय में पत्र व्यवहार कर रहे थे। लीला ने उन्हें असमंजस में देखकर कातर स्वर में पूछा कुछ बतला सकते हो क्या 1:00 बजे आओगे?


लाला जी ने शांत भाव से पूछा तुम्हारा जी आज कैसा हैं लीला?


क्या जवाब दे?


अगर कहती हैं की बहुत खराब हैं तो शायद वे महाशय वहीं बैठ जाये और उसे जली कटी सुना कर अपने दिल का बुखार निकाले।अगर कहती हैं की अच्छी हूँ तो शायद निश्चिंत होकर 2:00 बजे तक की ही खबर ले। इस दुविधा में डरते डरते बोली अब तक तो हल्की थी लेकिन अब कुछ भारी हो रही हैं। तुम जाओ दुकान पर लोग तुम्हारी राह देखते होंगे हाँ ईश्वर के लिए एक दोना बजा देना लड़के सो जाते हैं मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता ये घबराता हैं सेठ जी ने अपने स्वर में स्नेह की चाशनी देकर कहा, 12:00 बजे तक आज जरूर जाऊंगा।लीला का मुख धूमिल हो गया। उसने कहा, 10:00 बजे तक नहीं आ सकते 11.5 से पहले किसी तरह नहीं नहीं 10.5 अच्छा 11:00 बजे लाला वादा करके चले गए, लेकिन 10:00 बजे रात को एक मित्र ने मुजरा सुनने के लिए बुला भेजा। इस निमंत्रण को कैसे इंकार करते थे?


जब एक आदमी आपको खातिर से बुलाता हैं।तब ये कहा की भलमन साथ हैं की आप उसका निमंत्रण अस्वीकार कर दे। लाला जी मुजरा सुनने चले गए, 2:00 बजे लौटे, चुपके से आकर नौकर को जगाया और अपने कमरे में आकर लेट रहे। लीला उनकी राह देखती, प्रतिक्षण वेदना का अनुभव करती हुई न जाने कब सो गई थी। अंत को इस बिमारी ने अभागिनी लीला की जान ही लेकर छोड़ा। लाला जी को उसके मरने का बड़ा धोखा हुआ। मित्रों ने संवेदना के तार भेजे।एक दैनिक पत्र ने शोक प्रकट करते हुए लीला के मानसिक और धार्मिक सदगुणों को खूब बढ़ाकर वर्णन किया। लाला जी ने इन सभी मित्रों को हार्दिक धन्यवाद दिया और लीला के नाम से बालिका विद्यालय में पांच वजीफे प्रदान किए तथा मृतक भोज तो जीतने समारोह से किया गया। वह नगर के इतिहास में बहुत दिनों तक याद रहेगा। लेकिन एक महीना भी ना गुज़रने पाया था कि लाला जीके मित्रों ने चारा डालना शुरू कर दिया।और उसका यह असर हुआ कि छह महीने की विधुरता के तप के बाद उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया। आखिर बेचारे क्या करते हैं?


जीवन में एक सहचर्य की आवश्यकता तो थी ही और इस उम्र में तो एक तरह से वह अनिवार्य हो गई थी जब से नई पत्नी आई लाला जीके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया। दुकान से अब उतना प्रेम नहीं था।लगातार हफ्तों न जाने में भी उनके कारोबार में कोई हर्ज नहीं होता था। जीवन के उपभोग की जो शक्ति दिनदिन क्षीण होती जाती थी, अब वह छींके पाकर सजीब हो गई थी। सूखा पैर हरा हो गया था, उसमें नई नई कोपले फूटने लगी थी, मोटर नई आ गई थी, कमरे में ये फर्निचर से सजा दिए गए थे, नौकरों की भी संख्या बढ़ गई थी, रेडियो आ पहुंचा था और प्रतिदिन नए नए उपहार आते रहते थे।लाला जी की बोली जवानी जवानों की जवानी से भी प्रखर हो गई थी। उसी तरह जैसे बिजली का प्रकाश चंद्रमा के प्रकाश से ज्यादा स्वच्छ और मनोरंजक होता है। लाला जी को उनके मित्र इस रूपांतर पर बधाइयां देते जब वे गर्व के साथ कहते भाई हम तो हमेशा जवान रहे और हमेशा जवान रहेंगे। बुढ़ापा यहाँ आए तो उसके मुँह में कालिख लगा कर गद्दों पर उल्टा सवार कराके शहर से निकाल दे।जवानी और बुढ़ापे को न जाने क्यों लोग अवस्था से सम्बन्ध कर देते हैं। जवानी का उम्र से उतना ही सम्बन्ध हैं जितना धर्म का, आचार्य से, रुपए का, ईमानदारी से रूप का, श्रृंगार से आज कल के जवानों को आप जवान कहते हैं। उनकी 1000 जवानियों को अपने घंटे से भी ना बदलूँगा मालूम होता हैं। उनकी ज़िन्दगी में कोई उत्साह ही नहीं, कोई शौक नहीं। जीवन क्या हैं?


गले में पड़ा हुआ एक ढोल हैं।यही शब्द घटा बढ़ाकर वे आशा के हृदय पटल पर अंकित करते रहे थे। उसे बराबर सिनेमा, थिएटर और दरिया की सैर के लिए आग्रह करते रहते, लेकिन आशा को न जाने क्यों इन बातों में ज़रा भी रूचि ना थी। वह जाती तो थी मगर बहुत ताल टूट करने के बाद 1 दिन लाला जी ने आकर कहा चलो आठ बजरे पर दरिया की सैर करे। वर्षा के दिन थे दरिया चढ़ा हुआ था।मेघमालाएं अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं की भांति रंग बिरंगी वर्दियां पहने आकाश में कवायद कर रही थी। सड़क पर लोग मलार और 12 मासा गाते चलते थे। बाघों में झूले पर गए थे। आशा ने बेदिल्ली से कहा, मेरा जी तो नहीं चाहता। लाला जी ने मृदु प्रेरणा के साथ कहा, तुम्हारा मन कैसा है?


जो आमोद प्रमोद की ओर आकर्षित नहीं होता?


चलो ज़रा दरिया की सैर देखो।सच कहता हूँ बजरे पर बड़ी बहार रहेंगी, आप जाये मुझे और कई काम करने हैं, काम करने को आदमी हैं, तुम क्यों काम करोगी महाराज अच्छा सालन नहीं पकाता। आप खाने बैठेंगे तो यों ही उठ जाएंगे। आशा अपने अवकाश का बड़ा भाग लाला जीके लिए तरह तरह का भोजन पकाने में ही लगाती थी। उसने किसी से सुन रखा था की एक विशेष अवस्था के बाद पुरुष के जीवन का सबसे बड़ा सुख।रसना का स्वाद ही रह जाता हैं। लाला जी की आत्मा खिल उठी। उन्होंने सोचा की आशा को उनसे कितना प्रेम हैं की वो दरिया की सैर को उनकी सेवा के लिए छोड़ रही हैं। एक लीला थी की माँ ना मान चलने को तैयार रहती थी, पीछा छुड़ाना पड़ता था। वहमखवाह सिर पर सवार हो जाती थी और सारा मज़ा खिरखिरा कर देती थी। स्नेह भरे उलाने से बोले तुम्हारा मन भी विचित्र हैं, अगर 1 दिन सालन भी का ही रहा।ऐसा क्या तूफान आ जाएगा?


तुम तो मुझे बिलकुल निकम्मा बना देती हो अगर तुम ना चलोगी तो मैं भी ना जाऊंगा। आशा ने जैसे गले से फंदा छुड़ाते हुए कहा, आप भी तो मुझे इधर उधर घूमा घूमा कर मेरा मिजाज़ बिगाड़ देते हैं, ये आदत पड़ जाएगी तो घर का धंधा कौन करेगा?


मुझे घर के धंधों की रस्सी भर भी परवाह नहीं, बाल की नोंक बराबर भी नहीं।मैं चाहता हूँ की तुम्हारा मिजाज़ बिगड़े और तुम गृहस्थी की चक्की से दूर रहो और तुम मुझे बार बार आप क्यों कहती हो, मैं चाहता हूँ तुम मुझे तुम कहो तू कहो, गालिया दो ढोल जमाओ तुम तो मुझे आप कह के जैसे देवता के सिंहासन पर बैठा देती हो, मैं अपने घर में देवता नहीं, चंचल बालक बनना चाहता हूँ आसानी मुस्कुराने की चेष्टा करके कहा भला मैं आपको तुम कहूँगी।तुम बराबर वाले को कहा जाता है कि बड़ों को मुनीम ने 1,00,000 के घाटे की खबर सुनाई होती तो भी शायद लाला जी को इतना दुख ना होता जितना आशा के इन कठोर शब्दों से हुआ। उनका सारा उत्साह सारा उल्लास जैसे ठंडा पड़ गया। सिर पर बांकी रखी हुई फूलदार टोपी, गले में परी हुई जोगी या रंग की चुनी हुई रेशमी चादर, वह कंजेब का बेल, दावे कुत्ताजिसमें सोने के बटन लगे हुए थे ये सारा ठाठ कैसे?


उन्हें हंस के जनक जान करने लगा जैसे वो सारा नशा किसी मंत्र से उतर गया हो मेरा आंसू कर बोले तो तुम्हें चलना हैं या नहीं?


मेरा जी नहीं चाहता तो मैं भी ना जाऊं, मैं आपको कब मना करती हूँ?


फिर आप कहा आह आशा ने जैसे भीतर से ज़ोर लगाकर कहा।तुम और उसका मुखमंडल लज्जा से आरक्त हो गया। हाँ, इसी तरह तुम कहा करो तो तुम नहीं चल रही हो। अगर मैं कहूँ तुम्हे चलना पड़ेगा तब चलूँगी आपकी आज्ञा मानना मेरा धर्म हैं लाला जी आज्ञा ना दे सके। आज्ञा और धर्म जैसे शब्द उनके कानों में चुभने से लगे किसी आये हुए बाहर को चल पड़े। उस वक्त आशा को उन पर दया आ गई। बोली।तो कब तक लौटोगे मैं नहीं जा रहा हूँ अच्छा तो मैं भी चलती हूँ जैसे कोई जिद्दी लड़का रोने के बाद अपनी इच्छित वस्तु पाकर उसे पैरों से ठुकरा देता हैं। उसी तरह लाला जी ने मुँह बनाकर कहा तुम्हारा जी नहीं करता तो ना चलो मैं आग्रह नहीं करता आप नहीं तुम बुरा मान जाओगे। आशा गई लेकिन उमंग से नहीं। इस मामूली देश में थी।उसी तरह चल खड़ी हुई न कोई सजीली साड़ी, न जलाओ गहने, न कोई सिंगार जैसे कोई विधवा हो। ऐसी ही बातों पर लाला जी मन में झुंझला उठते थे। ब्याह किया था जीवन का आनंद उठाने के लिए, झिन मिलाते हुए दीपक में तेल डाल कर उसे और छटक करने के लिए अगर दीपक का प्रकाश तेज न हुआ तो तेल डालने से लाभ न जाने इसका मन क्यों इतना शुष्क और नीरस हैं, जैसे कोई उसर का पैर हो, कितना ही पानी डालोउसमें हरी पत्तियों के दर्शन ना होंगे। ज़रा वो गहनों से भरी पेटारिया खुली हुई हैं कहाँ कहाँ से मंगवाए दिल्ली से कलकत्ता से कैसी कैसी बहुमूल्य साड़ियां रखी हुई हैं। एक नहीं सैकड़ों पर केवल संदूक में कीड़ों का भोजन बनने के लिए दरिद्र घर की लड़कियों में यही ऐब होता हैं। उनकी दृष्टि सदैव संकीर्ण रही हैं, ना खा सके ना पहन सके ना दे सके। उन्हें तो खजाना भी मिल जाए।तो यही सोचती रहेंगी की खर्च कैसे करे?


दरिया की सैर तो हुई पर विशेष आनंद न आया। कई महीने तक आशा की मनोवृत्तियों को जगाने का सफल प्रयत्न करके लाला जी ने समझ लिया की इसकी पैदाइश ही मुहर्रमी है, लेकिन फिर भी निराश न हुए। ऐसे व्यापार में एक बड़ी रकम लगाने के बाद वे उसमें अधिक से अधिक लाभ उठाने की वर्णिक प्रवृत्ति को कैसे त्याग देते?


विनोद की नई नई योजनाएं पैदा की जाती ग्रामोफोन अगर बिगड़ गया हैं, गाता नहीं या साफ आवाज नहीं निकलती तो उसकी मरम्मत करानी पड़ेगी। उसे उठाकर रख देना तो मूर्खता हैं। इधर बूढ़ा महाराज एकाएक बीमार हो कर घर चला गया था और उसकी जगह उसका 1718 साल का जवान लड़का आ गया था। कुछ अजीब गम्वार था, बिलकुल झंझट कोई बात ही न समझता था।जीतने भूल के बनाता उतनी तरह के। हाँ, एक बात समान होती सब बीच में मोटे होते किनारे पतले दाल कभी तो इतनी पतली जैसे चाय कभी इतनी गाड़ी जैसे नहीं नमक कभी इतना कम की बिलकुल फीकी, कभी इतना तेज की नींबू का शौकीन आशा मुँह हाथ धोकर चौके में पहुँच जाती और इस टपोर शंख को भोजन पकाना सिखाती 1 दिन उसने कहा तुम कितने नालायक आदमी हो चूके।आखिर इतनी उम्र तक तुम घास खोदते रहे या बाहर झोंकते रहे की फुल्के तक नहीं बना सकते। जुगल आँखों में आंसू भरकर कहता बहू जी अभी मेरी उम्र ही क्या है सत्रहवां ही तो पूरा हुआ है।आशा को उसकी बात पर हँसी आ गई। उसने कहा तो रोगियों पकाना क्या 10 5 साल में आता हैं आप एक महीना सीखा दे बाबूजी फिर देखिये मैं आपको कैसे भूल के खिलाता हूँ की जी खुश हो जाये जीस दिन मुझे फूल के बनाने आ जाएंगे। मैं आप से कोई इनाम लूँगा सालन तो अब मैं कुछ कुछ बनाने लगा हूँ क्यों आशा ने हौसला बढ़ाने वाली मुस्कराहट के साथ कहा सालन नहींवो बनाना आता हैं अभी कल ही नमक इतना तेज था की खाया न गया मसाले में आ रही थी मैं जब सालन बना रहा था तब आप यहाँ कब थी?


अच्छा तो मैं जब यहाँ बैठी रहूं तब तुम्हारा सालन बढ़िया पकेगा। आप बैठी रहती हैं तब मेरी अकल ठिकाने रहती हैं। आशा को जुगल की इन भोली बातों पर खूब हँसी आ रही थी।हँसी को रोकना चाहती थी पर वह इस तरह निकली परती थी जैसे भरी बोतल उमरेल दी गई हो और मैं नहीं रहती तब तब तो आपके कमरे के द्वार पर जा बैठता हूँ, वहाँ बैठ कर अपनी तकदीर को रोता हूँ। आशा ने हँसी को रोक कर पूछा क्यों, रोते क्यों हो?


ये ना पूछिए बहू जी आप इन बातों को नहीं समझेंगे। आशा ने उसकी मुँह की ओर प्रश्न की आँखों से देखा।उसका आशय कुछ तो समझ गई पर ना समझने का बहाना किया। तुम्हारे दादा आ जाएंगे तब तुम चले जाओगे और क्या करूँगा बहुजी यहाँ कोई काम दिलवा दीजिएगा तो पड़ा रहूँगा मुझे मोटर चलाना सिखवा दीजिए आपको खूब सहन कराया करूँगा नहीं नहीं बहुजी आप हट जाइए, मैं पति भी उतार लूँगा, ऐसी अच्छी साड़ी है आपकी कही कोई डाट पड़ जाए तो क्या हो?


आशा पतीली उतार रही थी। जुगल ने उसके हाथ से सनरसी ले लेनी चाही। दूर रहो पूहर तो तुम हो ही कहीं पतीली पांव पर गिरा ली तो महीनों झीकोगे जुगल के मुख पर उदासी छा गई। आशा ने मुस्कुरा कर पूछा क्यों मुँह क्यों लटक गया सरकार का?


जुगल रोहन सा हो कर बोला आप मुझे डांट देती हैं बहू जी तब मेरा दिल टूट जाता हैं।सरकार कितना ही खुर्के मुझे बिलकुल ही दुख नहीं होता। आपकी नजर करी देख कर मेरा खून सर्द हो जाता हैं। आशा ने दिलासा दिया मैंने तुम्हे डाटा तो नहीं केवल ये ही तो कहा की कही पति भी तुम्हारे पांव पर गिर पड़े तो क्या हुआ?


हाथ ही तो आपका भी हैं कही आपके ही हाथ से छूट पड़े तो लाला डंगामल ने रसोई घर के द्वार पर आकर कहा आशा ज़रा यहाँ आना।देखो तुम्हारे लिए कितने सुन्दर गमले लाया हूँ तुम्हारे कमरे के सामने रखे जाएंगे तुम यहाँ धुएं, धाक कर में क्यों हलाकान होती हो इस लड़के से कह दो की जल्दी महाराज को बुलाये नहीं तो मैं कोई दूसरा आदमी रख लूँगा महाराजों की कमी नहीं हैं आखिर कब तक कोई रियायत करे?


गधो को ज़रा भी तमीज नहीं आई सुनता हैं जुगल लिखते आज अपने बाप को चूल्हे पर दवा रखा हुआ था, आशा रोगियों बेलने में लगी थी।जुगल तवे के लिए रोगियों का इंतजार कर रहा था। ऐसी हालत में भला आशा कैसे गमले देखने जाती। उसने कहा जुगल रोगियों टेढ़ी मेढ़ी बेल डालेगा लाला जी ने कुछ चिड़ कर कहा अगर रोगियों टेढ़ी मेढ़ी बेलगा तो निकाल दिया जायेगा आशा अनसुनी करके बोली 10 5 दिन में सीख जायेगा निकालने की क्या जरूरत हैं?


तुम आकर बतला दो।गमले कहा रखे जाये कहती तो हूँ रोटियां बेल कर आई जाती हूँ नहीं मैं कहता हूँ तुम रोटियां मत बेलो आप तो ख्वाम ख्वाब जिद करते हैं, लाला जी से नाटे में आ गए आशा ने कभी इतनी रूखाई से उन्हें जवाब ना दिया था और यह केवल रूखाई ना थी। इसमें कटुता भी थी, लग्गित हो कर चले गए। उन्हें ऐसा क्रोध आ रहा था की इन गमलों को तोड़ कर फेंक दे और सारे पौधों को चूल्हे में डाल दे।जुगल ने सहमे हुए स्वर ने कहा आप चली जाए बहु जी सरकार बिगड़ जाएंगे, हुको मत जल्दी जल्दी फुल्के सेंको नहीं तो निकाल दिए जाओगे और आज मुझ से रुपये लेकर अपने लिए कपड़े बनवा लो बिख मंगो की सी सूरत बनाये घूमते हो और बाल क्यों इतने बढ़ा रखे हैं तुम्हे नहीं भी नहीं जोड़ता जुगल ने दूर की बात सोंची बोला कपड़े बनवा लो तो दादा को हिसाब क्या दूंगा।अरे, पागल मैं हिसाब में नहीं देने कहती मुझसे ले जाना, जुगल काहिलपन की हँसी हँसा, आप बनवाएंगी तो अच्छे कपड़े लूँगा, खद्दर के मल, मल का कुर्ता, खद्दर की धोती, रेशमी चादर, अच्छा सा चप्पल। आशा ने मीठी मुस्कान से कहा, और अगर अपने दाम से बनवाने पड़े तो कपड़े ही क्यों बनवाऊंगा?


बड़े चालाक हो तुम जुगल ने अपनी बुद्धिमकता का प्रदर्शन किया। आदमी अपने घर में सूखी रोटियां खा कर सो रहता हैं, लेकिन दावत में तो अच्छे अच्छे पकवान ही खाता हैं। वहाँ भी यदि रूखी रोटियां मिले तो वह दावत में जाए ही नहीं। ये सब मैं नहीं जानती। एक गाड़ी का कुर्ता बनवा लो और एक टोपी ले लो। हसामत के लिए दो अने पैसे ऊपर से ले लो। जुगल ने मान करके कहा।रहने दीजिये, मैं नहीं लेता, अच्छे कपड़े पहन कर निकलूंगा तब तो आपकी याद आवेगी सरियल कपड़े पहन कर तो और ही जलेगा। तुम स्वार्थी हो, मुफ्त के कपड़े लोगे और साथ ही बढ़िया भी। जब यहाँ से जाने लगूंगा तब आप मुझे अपना एक चित्र दीजियेगा। मेरा चित्र लेकर क्या करोगे, अपनी कोठरी में लगाऊंगा और मिट के देखा करूँगा। बस वही साड़ी पहन कर खिंचवानाजो कल पहनी थी और वही मोतियों की माला भी हो। मुझे नंगी नंगी सूरत अच्छी नहीं लगती, आपके पास तो बहुत गहने होंगे, आप पहनती क्यों नहीं तो तुम्हे गहने अच्छी लगती हैं। बहुत लाला जी ने फिर आकर जलते हुए मन से कहा अभी तक तुम्हारी रोगियों नहीं पकी जुगल अगर कल से तुने अपने आप अच्छी रोगियों न पकाई तो मैं तुझे निकाल दूंगा।आशा ने तुरंत हाथ मुँह धोया और बड़े प्रसन्न मन से लाला जीके साथ गमले देखने चली। इस समय उसकी छवि में प्रफुल्लता की रौनक थी। बातों में भी जैसे शक्कर खुली हुई थी। लाला जी का सारा खिसियाना पन मिट गया था। उसने गमलो को मुखधाम आँखों से देखा। उसने कहा मैं इनमें से कोई गमला ना जाने दूंगी सब मेरे कमरे के सामने रखवाना सब कितने सुन्दर पौधे हैं वाह।इनके हिंदी नाम भी मुझे बतला देना लाला जी में चेहरा सब गमले क्या करोगी?


10 पांच पसंद कर लो शेष में बहार रखवा दूंगा। जी नहीं मैं एक भी नहीं छोड़ूंगी सब यही रखे जाएंगे बड़ी लाल चिन्ह हो तुम लाल चिन्ह ही सही, मैं आपको एक भी न दूंगी दो चार तो दे दो इतनी मेहनत से लाया हूँ जी नहीं इनमे से एक भी न मिलेगा।दूसरे दिन आशा ने अपने को आभूषण से खूब सजाया और की रोज़ी साड़ी पहन कर निकली। तब लाला जी की आँखों में ज्योति आ गई। समझे अवश्य ही अब उनके प्रेम का जादू कुछ कुछ चल रहा हैं, नहीं तो उनके बार बार की आग्रह करने पर भी बार बार याचना करने पर भी उसने कोई आभूषण ना कहना था, कभी कभी मोतियों का हार गले में डाल लेती थी, वह भी ऊपरी मन से।आज वह आभूषणों से अलंकृत होकर फूली नहीं समाती। इतराई जाती हैं मानो कहती हो, देखो मैं कितनी सुन्दर हूँ पहले जो बंद करि थी वह आज खेल गई थी लाला जी पर घरो नशा चढ़ा हुआ था वे चाहते थे उनके मित्र और बंधु वरमाकर इस सोने की रानी के दर्शनों से अपनी आँखें ठंडी करे। देखिए की वह कितनी सुखी, संतुष्ट और प्रसन्न है।जिन विद्रोहियों ने विवाह के समय तरह तरह की शंकाएं की थी, वे आँखें खोल कर देखें की डंगा मल कितना सुखी है। विश्वास, अनुराग और अनुभव ने चमत्कार किया है। उन्होंने प्रस्ताव किया, चलो कहीं घूम आये बड़ी मजेदार हवा चल रही है। आशा इस वक्त कैसे जा सकती थी?


अभी उसे रसोई में जाना था। वहाँ से कहीं 12:01 बजे फुर्सत मिलेंगे फिर घर के दूसरे धंधो सिर पर सवार हो जाएंगे।सैर सपाटे के पीछे क्या घर चौपट कर दे?


सेठ जी ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा नहीं आज मैं तुम्हे रसोई में ना जाने दूंगा। महाराज के किए कुछ ना होगा तो आज उसकी शामत भी आ जाएगी। आशा के मुख पर से वो प्रफुल्लता जाती रही। मन भी उदास हो गया। एक सूफे पर लेट कर बोली, आज न जाने क्यों कलेजे में मीठा मीठा दर्द हो रहा है।ऐसा दर्द कभी नहीं होता था। शेर से घबरा उठे। ये दर्द कब से हो रहा हैं?


हो तो रहा हैं रात से ही, लेकिन अभी कुछ कम हो गया था अब फिर होने लगा हैं रह रह कर जैसे चुहन हो जाती हैं शेर जी एक बात सोच कर दिल ही दिल में फूल उठे, अब वे गोलियां रंग ला रही हैं। राज़ वैद्य जी ने कहा भी था की ज़रा सोच समझ कर इनका सेवन कीजियेगा क्यों ना हो?


खानदानी वैद्य हैं।इनके बाप बनारस के महाराज के चिकित्सक थे। पुराने और परीक्षित नुस्खे हैं इनके पास। उन्होंने कहा तो रात से ही ये दर्द हो रहा हैं। तुमने मुझसे कहा नहीं, नहीं तो वैद्य जी से कोई दवा मंगवाना मैंने समझा था आप ही आप अच्छा हो जाएगा मगर अब बढ़ रहा हैं, कहा दर्द हो रहा हैं ज़रा देखूं, कुछ सूजन तो नहीं हैं?


सेठ जी ने आशा की आंचल की तरफ हाथ बढ़ाया।आशा ने शर्मा कर सिर झुका लिया। उसने कहा ये तुम्हारी शरारत मुझे अच्छी नहीं लगती, मैं अपनी जान से मरती हूँ, तुम्हे हँसी सूझती हैं, जा कर कोई दवा ला दो। सेठा जी अपने पुंजत्व का या डिप्लोमा पाकर उससे कहीं ज्यादा प्रसन्न ना हुए, जितना राय बहादुरी पाकर होते, इस विजय का डंका पीते बिना उन्हें कैसे चेन आ सकता था?


जो लोग उनके विवाह के विषय में द्वेषमय टिप्पणियां कर रहे थे।उन्हें नीचा दिखाने का कितना अच्छा अफसर हाथ आया हैं और इतनी जल्दी पहले पंडित भोलानाथ के पास गए और भाग के ठोकर बोले भाई मैं तो बड़ी विपत्ति में फंस गया। कल से उनके कलेजे में दर्द हो रहा हैं। कुछ बुद्धि काम नहीं करती। कहती हैं ऐसा दर्द पहले कभी नहीं हुआ था। भोलानाथ ने कुछ बहुत हमदर्दी ना दिखाई।सेठ जी यहाँ से उठकर अपने दूसरे मित्र लाला फगमल के पास पहुंचे और उनसे भी लगभग इन्हीं शब्दों में यह शोक संवाद कहा फगमल भरा शोदा था मुझको आकर बोला मुझे तो आपकी शरारत मालूम होती हैं। सेठ जी की बांछे खिल गयी। उन्होंने कहा, मैं अपना दुख सुना रहा हूँ और तुम्हे दिल्लगी सूझती हैं। ज़रा भी आदमी हैं तुम में नहीं हैं।मैं दिल्लगी नहीं कर रहा हूँ, इसमें दिल्लगी की क्या बात है?


वे हैं कम से कमलांगी आप ठहरे पुराने लठैत दंगल के पहलवान बस अगर ये बात ना निकले तो मूछें मुरा लो सेठ की आँखें जगमगा उठी। मन में यौवन की भावना प्रबल हो उठी और उसके साथ ही मुख पर भी यौवन की झलक आ गई। छाती जैसे कुछ फैल गई।चलते समय उनके पग कुछ अधिक मजबूती से ज़मीन पर पड़ने लगे और सिर की टोपी भी न जाने कैसे बाकी हो गई। आकृति से बांकपन की शान बरसने लगी। जुगल ने आशा को सिर से पांव तक जगमगा के देख कर कहा बस बहू जी आप इसी तरह पहने ओड़े रहा करे, आज मैं आपको चूल्हे के पास नहाने दूंगा। आशा ने नयन बांड चला कर कहा क्यों?


आज ये नया हुक्म क्यों?


पहले तो तुमने कभी मना नहीं किया, आज की बात दूसरी हैं। ज़रा सुनो क्या बात हैं?


मैं डरता हूँ आप कही नाराज ना हो जाए नहीं नहीं कहो मैं नाराज ना होउंगी आज आप बहुत सुन्दर लग रही हैं। लाला डंडामल ने असन के बाहर आशा के रूप और यौवन की प्रशंसा की थी।मगर उनकी प्रशंसा में उसे बनावट की गंध आती थी। वह शब्द उनके मुख से निकल कर कुछ ऐसे लगते थे जैसे कोई पंगू दौड़ने की चेष्टा कर रहा हो। जुगल के इन सीधे शब्दों में एक उन्मात था, नशा था, एक चोट थी, आशा की सारी देह प्रकंपित हो गई। तुम मुझे नजर लगा दोगे जुगल इस तरह क्यों घूरते हो?


जब यहाँ से चला जाऊंगा तब आपकी बहुत याद आएगी रसोई पकाकर।तुम सारे दिन क्या किया करते हो दिखाई नहीं देते। सरकार रहते हैं इसी लिए नहीं आता। फिर अब तो मुझे जवाब मिल रहा हैं। देखिये भगवान कहा ले जाते हैं आशा की मुख मुद्रा कठोर हो गई। उसने कहा कौन तुम्हे जवाब देता हैं?


सरकार ही तो कहते हैं तुझे निकाल दूंगा अपना काम किये जाओ, कोई नहीं निकालेगा अब तो तुम फुलके भी अच्छे बनाने लगे।सरकार हैं। भरे गुस्से वर दो 4 दिन में उनका मिजाज़ ठीक किये देती हूँ। आपके साथ चलते हैं तो आपके बाप से लगते हैं, तुम बड़े मोहब्बत हो, खबरदार जबान संभाल कर बाते किया करो। किन्तु अप्रसन्नता का यह जीना आवरण उनके मनो रहस्य को न छुपा सका। वह प्रकाश की भांति उसके अंदर से निकला पड़ता था।जुगल ने फिर उसी निर्भीकता से कहा मेरा मुँह कोई बंद कर ले यहाँ ये सभी यही कहते हैं मेरा ब्याह कोई 50 साल की बुढ़िया से कर दे तो मैं घर छोड़ कर भाग जाऊं या तो खुद जहर खालो या उसे जहर दे कर मार डालू, खांसी ही तो होगी आशा उस कृत्रिम क्रोध को कायम ना रख सकी। जुगल ने उसके हृदय वीना के तारों पर मिज़रा की ऐसी चोट मारी थी।की उसके बहुत जब्त करने पर भी मन की व्यथा बाहर निकल आई। उसने कहा भाग्य भी तो कोई वस्तु है, ऐसा भाग्य जाये भाव में तुम्हारा प्यार किसी बुढ़िया से ही करूँगी। देख लेना तो मैं भी ज़हर खा लूँगा देख लीजिएगा क्यों?


बुढ़िया तुम्हे जवान स्त्री से ज्यादा प्यार करेगी, ज्यादा सेवा करेगी, तुम्हे सीधे रास्ते पर रखेगी। ये सब माँ का काम है।बीवी किस काम के लिए हैं, उसी काम के लिए हैं। आखिर बीवी किस काम के लिए हैं?


मोटर की आवाज आई ना जाने कैसे आशा के सिर कांचल के साथ कन्धों पर आ गया। उसने जल्दी से आंचल खींच कर सिर पर कर लिया और ये कहती हुई अपने कमरे की ओर लपकी की लाला भोजन नया विवाह - मुंशी प्रेमचंद की लिखी एक प्रेरणादायक कहानी | Naya Vivah - A Story by Munshi Premchand | 📎👇कर के चले जाए। तबाना।

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